दिलीप महालनाबिस का जीवन परिचय | |
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नाम | डॉ दिलीप महालनाबिस |
पत्नी | जयंती महालनाबिस |
जन्म तिथि | 12 नवम्बर 1934 |
मृत्यु | 16 अक्टूबर 2022 |
धर्म | हिन्दू |
पेशा | बाल रोग विशेषज्ञ |
जन्म स्थान | बंगाल प्रांत के किशोरगंज (वर्तमान बांग्लादेश) |
दिलीप महालनाबिस का जन्म 12 नवंबर 1934 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत के किशोरगंज जिले में हुआ था। उन्होंने इंटर्न के रूप में काम करने के बाद 1958 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में स्नातक किया। यूके में एनएचएस की स्थापना ने उन्हें यूके में चिकित्सा का पीछा करने का अवसर प्रदान किया, उन्होंने लंदन और एडिनबर्ग से डिग्री प्राप्त की।
जब वे यूके में थे, वे बच्चों के लिए क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल के रजिस्ट्रार के रूप में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। 1960 के दशक में वह कोलकाता में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी इंटरनेशनल सेंटर फॉर मेडिकल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (JH-CMRT) में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी में अपना शोध शुरू किया।
16 अक्टूबर 2022 को 87 वर्ष की आयु में पश्चिम बंगाल, कोलकाता के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। वह फेफड़ों के संक्रमण और वृद्धावस्था संबंधी अन्य बीमारियों से पीड़ित थे।
डॉ. दिलीप महालनाबिस ने ORS की खोज की थी। इसे 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय खोज माना जाता है। दुनियाभर में इससे हर साल 5 करोड़ लोगों की जान बचती है। डॉ. दिलीप बाल रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने 1966 में ORS पर काम करना शुरू किया था।
1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम चल रहा था, उस वक्त बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल आ रहे थे। ये लोग पश्चिम बंगाल में राहत शिविरों में रह रहे थे। उस दौरान कैंपों में हैजा फैल गया। कई शरणार्थी बीमार हो गए थे, तब डॉ दिलीप महालनाबिस ने ORS के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर सैकड़ों जानों को बचाया था। इसके बाद ओआरएस को दुनिया भर में लोकप्रियता मिली। ओआरएस ने हैजा महामारी के दौरान मृत्यु दर को कम करके ‘संजीवनी’ के तौर पर काम किया।
1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान डॉ महालनाबिस और उनकी टीम ने भारत और पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर काम किया, उनका उपचार केंद्र बनगाँव में स्थित था। दो कॉटेज में उनके लिए उपलब्ध 16 बिस्तर जो हैजा वार्ड के रूप में काम करते थे, शहर के आसपास रहने वाले 350,000 शरणार्थियों की सेवा करने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त थे।
उस समय उपलब्ध शोध के आधार पर, महालनाबिस और उनकी टीम को भरोसा था कि शुरुआती चरणों में घातक निर्जलीकरण को रोकने के लिए केवल ओरल रिहाइड्रेशन ही पर्याप्त होगा। ओआरएस के चलते रिफ्यूजी कैंप में मरीजों की मृत्युदर 30 फीसदी से घटकर 3 फीसदी तक हो गई।
इस दौरान डॉ धीमान बरुआ, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की जीवाणु रोग इकाई के प्रमुख थे, उन्होंने महालनाबिस द्वारा प्रबंधित शिविर का दौरा किया और विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ में उपचार को साहसपूर्वक बढ़ावा देना शुरू किया। इसके बावजूद वैज्ञानिक समुदाय ने महालानबीस के इलाज पर संदेह व्यक्त किया और कई पत्रिकाओं ने उनके मूल पेपर को प्रकाशित करने से मना कर दिया।
ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी को डायरिया और अन्य बीमारियों से निर्जलीकरण के लिए एक अच्छे उपचार के रूप में स्वीकार करने में 7 और साल लगें। उन्होंने अपने ओआरएस फॉर्मूले का कभी पेटेंट नहीं कराया।
डॉ दिलीप महालनाबिस ने ORS की खोज की थी। इसे 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय खोज माना जाता है। जिसके लिए ओआरएस के जनक और मशहूर बाल चिकित्सक डॉ दिलीप महालनोबिस को पद्म सम्मान देने की घोषणा की गयी है। इन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान दिया जायेगा.
1994 में, महालनाबिस को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज का विदेशी सदस्य चुना गया। 2002 में डॉ महालनाबिस, डॉ नथानिएल पियर्स, डॉ डेविड नलिन और डॉ नॉर्बर्ट हिर्शोर्न को ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी की खोज और कार्यान्वयन में उनके योगदान के लिए बाल चिकित्सा अनुसंधान में पहला पोलिन पुरस्कार प्रदान किया गया था। 2006 में डॉ महालनाबिस, डॉ रिचर्ड ए। कैश और डॉ डेविड नलिन को ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी के विकास और अनुप्रयोग में उनकी भूमिका के लिए भी प्रिंस महिदोल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
दिलीप महालनाबिस को मिले पुरस्कारों की सूची | |
पोलिन पुरस्कार | 2002 |
प्रिंस महिदोल पुरस्कार | 2006 |
पद्म विभूषण | 2023 |
बालकृष्ण दोशी का जीवन परिचय | |
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नाम | बालकृष्ण दोशी |
पूरा नाम | बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी |
माता का नाम | राधा दोशी |
पिता का नाम | विट्ठलदास दोशी |
पत्नी | कमला पारिख |
जन्म तिथि | 26 अगस्त 1927 |
मृत्यु | 24 जनवरी 2023 |
धर्म | हिंदू |
बालकृष्ण दोशी का पूरा नाम बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी था। इनका जन्म 26 अगस्त 1927 को विट्ठलदास दोशी के घर हुआ था। इन्हें भारत के पहले वास्तुकार के रुप में जाना जाता है। बालकृष्ण दोशी भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट सेंट्रल विस्टा के प्रमुख वास्तुकार थे। जिनका 24 जनवरी 2023 को निधन हो गया।
भारतीय वास्तुकला में इनके महत्त्वपूर्ण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने तुरंत इस महान वास्तुकार को पद्म विभूषण से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।
Balkrishna Doshi Biography in Hindi : बालकृष्ण दोशी ने अहमदाबाद में सीईपीटी यूनिवर्सिटी, कनोरिया सेंटर फॉर आर्ट्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, बैंग्लूरु में आईआईएम और इंदौर में निम्न से मध्यम आय वाले परिवारों के लिए एक टाउनशिप Aranya Low-cost Housing जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर चुके हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी जिस चंडीगढ़ के वास्तुकार के रुप सिर्फ ले कार्बूजियर को ही याद किया जाता है, उसमें बालकृष्ण दोशी का भी बड़ा योगदान था। ले कार्बूजियर के साथ काम करते हुए उन्होंने चण्डीगढ़ की हाईकोर्ट और गवर्नर पैलेस को डिजाइन करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1956 में इन्होंने वास्तुशिल्प के नाम से अपने फर्म की स्थापना की, जिसे बाद में वास्तुशिल्प कंसल्टेंट्स के नाम जाना गया।
प्रित्जकर पुरस्कार को आर्किटेक्ट (वास्तुकला) के नोबल पुरस्कार के रुप में जाना जाता है। साल 2018 में इस पुरस्कार से सम्मानित होकर बालकृष्ण दोशी भारत को इस क्षेत्र में गौरवान्वित करने का भी काम किया है।
इसके अलावा भी बालकृष्ण दोशी अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं-
बालकृष्ण दोशी को मिले पुरस्कारों की सूची | |
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पद्म श्री | 1976 |
ग्लोबल अवार्ड फाॅर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर | 2007 |
दि ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स (कला के क्षेत्र में फ्रांस का उच्चतम पुरस्कार) | 2011 |
धीरुभाई ठक्कर सव्यसाची सारस्वत अवार्ड | 2017 |
प्रित्जकर आर्किटेक्चर अवार्ड | 2018 |
पद्म भूषण | 2020 |
डाक्ट्रेट की मादन उपाधि (पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी) | – |
रॉयल गोल्ड मेडल | 2022 |
पद्म विभूषण | 2023 |
आपको जानकर शायद हैरानी होगी लेकिन बालकृष्ण दोशी बाॅलीवु़ड की फिल्म ओके जानू में भी काम कर चुके हैं। जिसके साथ ही सबसे ज्यादा उम्र में फिल्म डेब्यू का रिकाॅर्ड भी उनके नाम भी दर्ज हो गया है।
ओके जानू फिल्म में बालकृष्ण दोशी ने एक वास्तुकार की ही भूमिका निभाई है। इस फिल्म के डायरेक्टर के कहने पर इन्होंने इस अनुरोध स्वीकार कर लिया था।
]]>तो आइए आज के इस आर्टिकल में हम Khashaba Dadasaheb Jadhav biography in hindi में पढ़ते हैं और जानते हैं कि इन्होंने कैसे ओलंपिक में पहलवानी का पदक जीता?
Khashaba Jadhav information को जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि यह कौन थे और इनको इतना क्यों याद किया जाता है? तो हम आपको बता दें कि यह एक एथलीट और पहलवान थे जिन्होंने 1952 की ओलंपिक में हेलेन्सिकी में सबसे पहला कांस्य पदक जीता था और भारत देश का नाम रोशन किया था।
दरअसल केडी जाधव भारत के सबसे पहले एथलीटों में से एक थे जिन्होंने भारत के लिए पहलवानी में कांस्य पदक जीता था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भी 1948 में की थी और उसके बाद 1952 में ओलंपिक का पदक जीतकर लाइमलाइट में आए। इसके साथ ही कुश्ती के क्षेत्र में इन्हें अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।
खाशाबा दादासाहेब जाधव का जन्म 15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में गोलेश्वर गांव में हुआ था। इन्हे हम केडी जाधव के नाम से भी जानते हैं। इनके पिता का नाम दादासाहेब जाधव था जो कि एक पहलवान थे। इनका परिवार शुरू से ही पहलवानी और कुश्ती के क्षेत्र में था जिसके कारण केडी जाधव जी भी पहलवानी के क्षेत्र में ही आगे बढ़े।
इसके बाद खाशाबा जाधव जी की शिक्षा 1940 से 1947 तक चली जोकि सतारा के कराड तालुका गांव में तिलक हाई स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने बचपन से ही पहलवानी सीखना भी शुरू कर दिया था। साथ ही इनके परिवार भारत छोड़ो आंदोलन में भी शामिल थे जिसके अंतर्गत इन्होंने कुछ भारतीय क्रांतिकारियों को रहने और सपने में भी मदद की थी। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था तब इन्होंने ओलंपिक में तिरंगा झंडा लहराने की शपथ भी ली थी।
तो जैसा कि हमने आपको बताया केडी जाधव जी को बचपन से ही कुश्ती करने का शौक था क्योंकि उनके परिवार भी कुश्ती के क्षेत्र में ही थे। इसीलिए उनके करियर की शुरुआत सबसे पहले अपने घर से हुई और इनके सबसे पहले कोच इनके पिता दादा साहेब जी थे।
जब केडी जाधव जी कॉलेज में थे तब भी इन्होंने कुश्ती सीखना जारी रखा और उस समय उनके कोच गुरु बाबूराव बलवाड़ा और बेलापूरी बने। हालांकि यह कुश्ती के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे परंतु इन्होंने कॉलेज में भी अच्छे ग्रेड लाए थे।
धीरे-धीरे उन्होंने सन 1948 में अपने असली कुश्ती की शुरुआत की और लंदन में 1948 के ओलंपिक में इन्होंने काफी ज्यादा सुर्खियां बटोरी। हालांकि यह 1948 के ओलंपिक में नहीं जीत पाए थे लेकिन यह छठे स्थान पर रहे थे। लेकिन 1948 में यह लाइमलाइट में इसलिए बने रहे क्योंकि पहली बार किसी भारतीय ने व्यक्तिगत रूप से इतनी ऊंची श्रेणी प्राप्त की थी।
1948 में ओलंपिक ना जीतने का इन्हें काफी दुख था इसीलिए इन्होंने 4 साल तक 1952 के ओलंपिक के लिए काफी ज्यादा प्रशिक्षण लिया और मेहनत भी की। साथ ही साथ इन्होंने अपने भर में भी सुधार किया और फ्लाईवेट वर्ग में भी हिस्सा लिया था।
1952 के ओलंपिक में इन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया और मेक्सिको, जर्मनी, कनाडा, जैसे- देशों के पहलवानों को भी हराया था। हालांकि यह सेमीफाइनल में हार गए थे लेकिन उन्होंने भारत के लिए पहला व्यक्तिगत कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था।
ओलंपिक जीतने के बाद इन्होंने 1955 में पुलिस विभाग ज्वाइन किया जहां पर यह सब इंस्पेक्टर थे। लेकिन बाद में इन्हें पेंशन के लिए काफी ज्यादा संघर्ष करना पड़ा था।
1948 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में इन्हें यात्रा का पहला स्पॉन्सर मिला, जोकि कोल्हापुर के महाराजा ने किया था। जब यह ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में कुश्ती के लिए गए थे तो उन्होंने पहले कभी भी कुश्ती मैट पर पहलवानी नहीं की थी फिर भी यह फ्लाइट वेट डिवीजन में छठे स्थान पर आए थे।
1948 के ओलंपिक में जब उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के पहलवान को केवल कुछ ही मिनट में नॉकआउट कर दिया था तो सभी जनता देख कर चौकन्नी रह गई थी। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के बिली जेर्निगन को भी हराया था, लेकिन बाद में वह इरान के पहलवान मनसूर रायसी से हार गए।
खाशाबा जाधव जी का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक काफी दिलचस्प रहा था। 1948 में हारने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने वजन पर ध्यान दिया और 125 पाउंड बेंटमवेट डिवीजन में 24 अलग-अलग देशों के पहलवान के बीच प्रतिस्पर्धा की।
1952 का ओलंपिक केडी जाधव जी के लिए काफी थका देने वाला था। क्योंकि एक मैच के बाद उन्हें तुरंत ही सोवियत संघ के राशिद मम्मडबेव से कुश्ती करने के लिए कहा गया था, जबकि किसी भी एक मैच के बाद 30 मिनट का ब्रेक होता है। फिर भी केडी जाधव जी राशिद से लड़े परंतु बहुत ही थके हारे होने के कारण वे इस मैच में हार गए।
परंतु फिर भी इन्होंने अपनी काफी ज्यादा हिम्मत दिखाई थी और 23 जुलाई 1952 को कई अलग-अलग पहलवानों को हराकर यह भारत के पहले पदक विजेता बने।
खाशाबा दादासाहेब जी की मृत्यु सन 1984 में एक कार के दुर्घटना में हुई थी। उनकी पत्नी ने खाशाबा जी के लिए सहायता प्राप्त करने की भी कोशिश की पर वह नाकाम रही जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई।
आज के इस लेख में हमने Khashaba Dadasaheb Jadhav biography in hindi जाना। उम्मीद है कि इस लेख के माध्यम से आपको खासाबा दादा साहेब जी की कुश्ती और उनके बारे में अच्छी जानकारियां मिल पाई होंगी।
]]>वैसे तो आपने अब से सेना के बहुत से जवानों की बायोग्राफी पड़ी होंगी परंतु सेना के जिस जवान की बायोग्राफी आज हम आपको बताएंगे वह बिल्कुल ही अलग हैं। यह सेना के वीर जवान Ian Cardozo की बायोग्राफी हैं। यह एक ऐसे बहादुर थे जिन्होंने जंग में घायल होने के पश्चात खुद ही अपना पैर काट लिया था और इसके बाद भी दुश्मनों से लड़ते रहे थें। आगे हम आपको Ian Cardozo के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।
मेजर जनरल इयान कार्डोजो का जीवन परिचय | |
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नाम | इयान कार्डोजो |
पिता का नाम | विंसेट कार्डोजो |
माता का नाम | डायना कार्डोजो |
पत्नी का नाम | प्रिसिला कार्डोजो |
जन्म तिथि | 7 अगस्त 1937 |
जन्म स्थान | मुंबई |
पद | मेजर जनरल |
सेना में सेवा दी | 1954 से 1993 तक |
लड़ाई और युद्ध | 1971 भारत पाकिस्तान का युद्ध व सिलहट का युद्ध |
पुरस्कार | सेना पदक व अति विशिष्ट सेवा पदक |
पुत्र व पुत्री | इनकी तीन संतान है |
अध्यक्ष | भारतीय पुनर्वास परिषद |
प्रसिद्धि | युद्ध में खुद अपना पैर काट लेना |
आंखों का रंग | काला |
यूनिट | 1/5 गोरखा राइफल्स एवं 4/5 गोरखा राइफल्स |
धर्म | ईसाई |
लंबाई | 5 फिट 8 इंच |
Ian Cardozo सेना के एक ऐसे जवान हैं जिनका जन्म 7 अगस्त 1937 में भारत में ही हुआ था। उन्होंने 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय बारूद से घायल होने के पश्चात खुद ही खुर से अपने पैर को काट लिया था और इसके पश्चात भी यह लगातार लड़ाई लड़ते रहे थे।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन्हें रेजिमेंट के लोग कार्टूस साहिब के नाम से भी बुलाते थें। यह जबसे सेना में भर्ती हुए थे तो तभी से ही यह बहुत ज्यादा निडर थे और कभी भी युद्ध में पीछे नहीं आते थें।
इस समय Ian Cardozo जीवित है और उनकी आयु लगभग 84 वर्ष हैं। यह अपने परिवार के साथ मुंबई महाराष्ट्र में ही रहते हैं।
Major General Ian Cardozo एक दमदार गोरखा सैनिक थे जिन्होंने खुद ही अपना पैर काटने के पश्चात भी युद्ध नहीं छोड़ा। इसीलिए इनकी इसी बहादुरी की वजह से इन पर फिल्म बन रही है जिसमें Major General Ian Cardozo का किरदार अक्षय कुमार निभा रहे हैं।
इस फिल्म में इनके बचपन से लेकर वर्तमान समय तक हर एक दृश्य दिखाया जाएगा। साथ ही यह भी दिखाया जाएगा कि इन्होंने किस प्रकार निडर होकर खुद ही अपना पैर काटा था।