Biography – IndianGovs.com https://indiangovs.com Indian Gyan on Various Subjects Thu, 26 Jan 2023 10:53:31 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.1.1 https://indiangovs.com/wp-content/uploads/2021/06/cropped-indiangovs.com-fav-32x32.png Biography – IndianGovs.com https://indiangovs.com 32 32 195059859 जानिए कौन हैं दिलीप महालनाबिस, पूरा जीवन परिचय | Dilip Mahalanabis Biography in Hindi https://indiangovs.com/dilip-mahalanabis-biography-in-hindi/ https://indiangovs.com/dilip-mahalanabis-biography-in-hindi/#respond Thu, 26 Jan 2023 10:22:29 +0000 https://indiangovs.com/?p=6307 Read more

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Dilip Mahalanabis Biography in Hindi : आज हम भारत के एक ऐसे महान वैज्ञानिक के बारे में बताने वाले है जिन्होंने 1971 की जंग में जिस फॉर्मूले ने बचाई थी हजारों जानें। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया। लिस्ट में डॉ दिलीप महालनाबिस का नाम भी शामिल हैं, उन्हें पद्म विभूषण देने का ऐलान किया गया है। यहाँ पर आपको डॉ दिलीप महालनाबिस का जीवन परिचय और उनसे जुड़ी सभी महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलने वाली है।

Dilip Mahalanabis Biography in Hindi

दिलीप महालनाबिस का जीवन परिचय
नाम डॉ दिलीप महालनाबिस
पत्नी जयंती महालनाबिस
जन्म तिथि 12 नवम्बर 1934
मृत्यु 16 अक्टूबर 2022
धर्म हिन्दू
पेशा बाल रोग विशेषज्ञ
जन्म स्थान बंगाल प्रांत के किशोरगंज (वर्तमान बांग्लादेश)

Dilip Mahalanabis Biography in Hindi : प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

दिलीप महालनाबिस का जन्म 12 नवंबर 1934 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत के किशोरगंज जिले में हुआ था। उन्होंने इंटर्न के रूप में काम करने के बाद 1958 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में स्नातक किया। यूके में एनएचएस की स्थापना ने उन्हें यूके में चिकित्सा का पीछा करने का अवसर प्रदान किया, उन्होंने लंदन और एडिनबर्ग से डिग्री प्राप्त की।

जब वे यूके में थे, वे बच्चों के लिए क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल के रजिस्ट्रार के रूप में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। 1960 के दशक में वह कोलकाता में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी इंटरनेशनल सेंटर फॉर मेडिकल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (JH-CMRT) में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी में अपना शोध शुरू किया।

16 अक्टूबर 2022 को 87 वर्ष की आयु में पश्चिम बंगाल, कोलकाता के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हो गया। वह फेफड़ों के संक्रमण और वृद्धावस्था संबंधी अन्य बीमारियों से पीड़ित थे।

1971 की जंग में जिस फॉर्मूले ने बचाई थी हजारों जानें

डॉ. दिलीप महालनाबिस ने  ORS की खोज की थी। इसे 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय खोज माना जाता है। दुनियाभर में इससे हर साल 5 करोड़ लोगों की जान बचती है। डॉ. दिलीप बाल रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने 1966 में ORS पर काम करना शुरू किया था।

1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम चल रहा था, उस वक्त बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल आ रहे थे। ये लोग पश्चिम बंगाल में राहत शिविरों में रह रहे थे। उस दौरान कैंपों में हैजा फैल गया। कई शरणार्थी बीमार हो गए थे, तब डॉ दिलीप महालनाबिस ने ORS के इस्तेमाल को बढ़ावा देकर सैकड़ों जानों को बचाया था। इसके बाद ओआरएस को दुनिया भर में लोकप्रियता मिली। ओआरएस ने हैजा महामारी के दौरान मृत्यु दर को कम करके ‘संजीवनी’ के तौर पर काम किया।

1971 युद्ध के समय हुआ ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी की शुरुआत

1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान डॉ महालनाबिस और उनकी टीम ने भारत और पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर काम किया, उनका उपचार केंद्र बनगाँव में स्थित था। दो कॉटेज में उनके लिए उपलब्ध 16 बिस्तर जो हैजा वार्ड के रूप में काम करते थे, शहर के आसपास रहने वाले 350,000 शरणार्थियों की सेवा करने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त थे।

उस समय उपलब्ध शोध के आधार पर, महालनाबिस और उनकी टीम को भरोसा था कि शुरुआती चरणों में घातक निर्जलीकरण को रोकने के लिए केवल ओरल रिहाइड्रेशन ही पर्याप्त होगा। ओआरएस के चलते रिफ्यूजी कैंप में मरीजों की मृत्युदर 30 फीसदी से घटकर 3 फीसदी तक हो गई।

इस दौरान डॉ धीमान बरुआ, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की जीवाणु रोग इकाई के प्रमुख थे, उन्होंने महालनाबिस द्वारा प्रबंधित शिविर का दौरा किया और विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ में उपचार को साहसपूर्वक बढ़ावा देना शुरू किया। इसके बावजूद वैज्ञानिक समुदाय ने महालानबीस के इलाज पर संदेह व्यक्त किया और कई पत्रिकाओं ने उनके मूल पेपर को प्रकाशित करने से मना कर दिया।

ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी को डायरिया और अन्य बीमारियों से निर्जलीकरण के लिए एक अच्छे उपचार के रूप में स्वीकार करने में 7 और साल लगें। उन्होंने अपने ओआरएस फॉर्मूले का कभी पेटेंट नहीं कराया।

मोदी सरकार ने दिया पद्म विभूषण सम्मान

डॉ दिलीप महालनाबिस ने  ORS की खोज की थी। इसे 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय खोज माना जाता है। जिसके लिए ओआरएस के जनक और मशहूर बाल चिकित्सक डॉ दिलीप महालनोबिस को पद्म सम्मान देने की घोषणा की गयी है। इन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान दिया जायेगा.

Award Lists of Dilip Mahalanabis : कई सम्मानों से हो चुके है सम्मानित

1994 में, महालनाबिस को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज का विदेशी सदस्य चुना गया। 2002 में डॉ महालनाबिस, डॉ नथानिएल पियर्स, डॉ डेविड नलिन और डॉ नॉर्बर्ट हिर्शोर्न को ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी की खोज और कार्यान्वयन में उनके योगदान के लिए बाल चिकित्सा अनुसंधान में पहला पोलिन पुरस्कार प्रदान किया गया था। 2006 में डॉ महालनाबिस, डॉ रिचर्ड ए। कैश और डॉ डेविड नलिन को ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी के विकास और अनुप्रयोग में उनकी भूमिका के लिए भी प्रिंस महिदोल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

दिलीप महालनाबिस को मिले पुरस्कारों की सूची
पोलिन पुरस्कार 2002
प्रिंस महिदोल पुरस्कार 2006
पद्म विभूषण 2023
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जानिए कौन हैं बालकृष्ण दोशी, पूरा जीवन परिचय | Balkrishna Doshi Biography in Hindi https://indiangovs.com/balkrishna-doshi-biography-in-hindi/ https://indiangovs.com/balkrishna-doshi-biography-in-hindi/#respond Wed, 25 Jan 2023 18:41:48 +0000 https://indiangovs.com/?p=6288 Read more

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Balkrishna Doshi Biography in Hindi :  आज हम भारत के एक ऐसे महान वास्तुकार के बारे में बात करने जिन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं भारत के पहले वास्तुकार जिनका पूरा नाम बी. वी. दोशी (बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी) है। यहाँ पर आपको बालकृष्ण दोशी का जीवन परिचय और उनसे जुड़ी सभी महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलने वाली है।

Balkrishna Doshi Biography in Hindi

बालकृष्ण दोशी का जीवन परिचय
नाम बालकृष्ण दोशी
पूरा नाम बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी
माता का नाम राधा दोशी
पिता का नाम विट्ठलदास दोशी
पत्नी कमला पारिख
जन्म तिथि 26 अगस्त 1927
मृत्यु 24 जनवरी 2023
धर्म हिंदू

बालकृष्ण दोशी कौन थे?

बालकृष्ण दोशी का पूरा नाम बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी था। इनका जन्म 26 अगस्त 1927 को विट्ठलदास दोशी के घर हुआ था। इन्हें भारत के पहले वास्तुकार के रुप में जाना जाता है। बालकृष्ण दोशी भारत सरकार की महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट सेंट्रल विस्टा के प्रमुख वास्तुकार थे। जिनका 24 जनवरी 2023 को निधन हो गया।

भारतीय वास्तुकला में इनके महत्त्वपूर्ण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने तुरंत इस महान वास्तुकार को पद्म विभूषण से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

Balkrishna Doshi Biography in Hindi : बालकृष्ण दोशी ने अहमदाबाद में सीईपीटी यूनिवर्सिटी, कनोरिया सेंटर फॉर आर्ट्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, बैंग्लूरु में आईआईएम और इंदौर में निम्न से मध्यम आय वाले परिवारों के लिए एक टाउनशिप Aranya Low-cost Housing जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर चुके हैं।

Early Life of Balkrishna Doshi Biography in Hindi : महान वास्तुकार ले कार्बूजियर के साथ भी कर चुके हैं काम

आपको जानकर हैरानी होगी जिस चंडीगढ़ के वास्तुकार के रुप सिर्फ ले कार्बूजियर को ही याद किया जाता है, उसमें बालकृष्ण दोशी का भी बड़ा योगदान था। ले कार्बूजियर के साथ काम करते हुए उन्होंने चण्डीगढ़ की हाईकोर्ट और गवर्नर पैलेस को डिजाइन करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

1956 में इन्होंने वास्तुशिल्प के नाम से अपने फर्म की स्थापना की, जिसे बाद में वास्तुशिल्प कंसल्टेंट्स के नाम जाना गया।

  • आईआईएम अहमदाबाद का डिजाइन भी बालकृष्ण दोशी ने ही तैयार किया था।

Award Lists of Balkrishna Doshi : वास्तुकला के नोबल (प्रित्जकर पुरस्कार) से हो चुके हैं सम्मानित

प्रित्जकर पुरस्कार को आर्किटेक्ट (वास्तुकला) के नोबल पुरस्कार के रुप में जाना जाता है। साल 2018 में इस पुरस्कार से सम्मानित होकर बालकृष्ण दोशी भारत को इस क्षेत्र में गौरवान्वित करने का भी काम किया है।

इसके अलावा भी बालकृष्ण दोशी अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं-

बालकृष्ण दोशी को मिले पुरस्कारों की सूची
पद्म श्री 1976
ग्लोबल अवार्ड फाॅर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर 2007
दि ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स (कला के क्षेत्र में फ्रांस का उच्चतम पुरस्कार) 2011
धीरुभाई ठक्कर सव्यसाची सारस्वत अवार्ड 2017
प्रित्जकर आर्किटेक्चर अवार्ड 2018
पद्म भूषण 2020
डाक्ट्रेट की मादन उपाधि (पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी)
रॉयल गोल्ड मेडल 2022
पद्म विभूषण 2023

बाॅलीवुड में भी कर चुके हैं डेब्यू

आपको जानकर शायद हैरानी होगी लेकिन बालकृष्ण दोशी बाॅलीवु़ड की फिल्म ओके जानू में भी काम कर चुके हैं। जिसके साथ ही सबसे ज्यादा उम्र में फिल्म डेब्यू का रिकाॅर्ड भी उनके नाम भी दर्ज हो गया है।

ओके जानू फिल्म में बालकृष्ण दोशी ने एक वास्तुकार की ही भूमिका निभाई है। इस फिल्म के डायरेक्टर के कहने पर इन्होंने इस अनुरोध स्वीकार कर लिया था।

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जानिए कौन थे खाशाबा दादासाहेब जाधव, गूगल ने किया सम्मानित | Khashaba Dadasaheb Jadhav Biography in Hindi https://indiangovs.com/khashaba-dadasaheb-jadhav-biography-in-hindi/ https://indiangovs.com/khashaba-dadasaheb-jadhav-biography-in-hindi/#respond Mon, 16 Jan 2023 12:04:53 +0000 https://indiangovs.com/?p=6066 Read more

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आजकल लगभग सभी लोग खाशाबा दादासाहेब जाधव के बारे में बात कर रहे हैं। गूगल द्वारा भी 15 जनवरी को खाशाबा दादासाहेब जाधव का उनके जन्मदिन पर डूडल बनाया था और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। यह दुनिया के सबसे महान पहलवानों में से एक हैं और इसलिए लोग Khashaba Dadasaheb Jadhav Biography in Hindi को भी पढ़ना चाहते हैं और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।

Khashaba Dadasaheb Jadhav biography in hindi

तो आइए आज के इस आर्टिकल में हम Khashaba Dadasaheb Jadhav biography in hindi में पढ़ते हैं और जानते हैं कि इन्होंने कैसे ओलंपिक में पहलवानी का पदक जीता?

खाशाबा दादासाहेब कौन थे? (Khashaba Dadasaheb Jadhav Biography in Hindi)

Khashaba Jadhav information को जानने से पहले हम यह जान लेते हैं कि यह कौन थे और इनको इतना क्यों याद किया जाता है? तो हम आपको बता दें कि यह एक एथलीट और पहलवान थे जिन्होंने 1952 की ओलंपिक में हेलेन्सिकी में सबसे पहला कांस्य पदक जीता था और भारत देश का नाम रोशन किया था।

दरअसल केडी जाधव भारत के सबसे पहले एथलीटों में से एक थे जिन्होंने भारत के लिए पहलवानी में कांस्य पदक जीता था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भी 1948 में की थी और उसके बाद 1952 में ओलंपिक का पदक जीतकर लाइमलाइट में आए। इसके साथ ही कुश्ती के क्षेत्र में इन्हें अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।

खाशाबा दादासाहेब जाधव का प्रारंभिक जीवन परिचय

खाशाबा दादासाहेब जाधव का जन्म 15 जनवरी 1926 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में गोलेश्वर गांव में हुआ था। इन्हे हम केडी जाधव के नाम से भी जानते हैं। इनके पिता का नाम दादासाहेब जाधव था जो कि एक पहलवान थे। इनका परिवार शुरू से ही पहलवानी और कुश्ती के क्षेत्र में था जिसके कारण केडी जाधव जी भी पहलवानी के क्षेत्र में ही आगे बढ़े।

इसके बाद खाशाबा जाधव जी की शिक्षा 1940 से 1947 तक चली जोकि सतारा के कराड तालुका गांव में तिलक हाई स्कूल से पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने बचपन से ही पहलवानी सीखना भी शुरू कर दिया था। साथ ही इनके परिवार भारत छोड़ो आंदोलन में भी शामिल थे जिसके अंतर्गत इन्होंने कुछ भारतीय क्रांतिकारियों को रहने और सपने में भी मदद की थी। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था तब इन्होंने ओलंपिक में तिरंगा झंडा लहराने की शपथ भी ली थी।

खाशाबा जाधव जी का कुश्ती में करियर (Khashaba Dadasaheb Jadhav Career Biography in Hindi)

तो जैसा कि हमने आपको बताया केडी जाधव जी को बचपन से ही कुश्ती करने का शौक था क्योंकि उनके परिवार भी कुश्ती के क्षेत्र में ही थे। इसीलिए उनके करियर की शुरुआत सबसे पहले अपने घर से हुई और इनके सबसे पहले कोच इनके पिता दादा साहेब जी थे।

जब केडी जाधव जी कॉलेज में थे तब भी इन्होंने कुश्ती सीखना जारी रखा और उस समय उनके कोच गुरु बाबूराव बलवाड़ा और बेलापूरी बने। हालांकि यह कुश्ती के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे परंतु इन्होंने कॉलेज में भी अच्छे ग्रेड लाए थे।

धीरे-धीरे उन्होंने सन 1948 में अपने असली कुश्ती की शुरुआत की और लंदन में 1948 के ओलंपिक में इन्होंने काफी ज्यादा सुर्खियां बटोरी। हालांकि यह 1948 के ओलंपिक में नहीं जीत पाए थे लेकिन यह छठे स्थान पर रहे थे। लेकिन 1948 में यह लाइमलाइट में इसलिए बने रहे क्योंकि पहली बार किसी भारतीय ने व्यक्तिगत रूप से इतनी ऊंची श्रेणी प्राप्त की थी।

1948 में ओलंपिक ना जीतने का इन्हें काफी दुख था इसीलिए इन्होंने 4 साल तक 1952 के ओलंपिक के लिए काफी ज्यादा प्रशिक्षण लिया और मेहनत भी की। साथ ही साथ इन्होंने अपने भर में भी सुधार किया और फ्लाईवेट वर्ग में भी हिस्सा लिया था।

1952 के ओलंपिक में इन्होंने काफी अच्छा प्रदर्शन किया और मेक्सिको, जर्मनी, कनाडा, जैसे- देशों के पहलवानों को भी हराया था। हालांकि यह सेमीफाइनल में हार गए थे लेकिन उन्होंने भारत के लिए पहला व्यक्तिगत कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया था।

ओलंपिक जीतने के बाद इन्होंने 1955 में पुलिस विभाग ज्वाइन किया जहां पर यह सब इंस्पेक्टर थे। लेकिन बाद में इन्हें पेंशन के लिए काफी ज्यादा संघर्ष करना पड़ा था।

खाशाबा जाधव जी का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक 1948

1948 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में इन्हें यात्रा का पहला स्पॉन्सर मिला, जोकि कोल्हापुर के महाराजा ने किया था। जब यह ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में कुश्ती के लिए गए थे तो उन्होंने पहले कभी भी कुश्ती मैट पर पहलवानी नहीं की थी फिर भी यह फ्लाइट वेट डिवीजन में छठे स्थान पर आए थे।

1948 के ओलंपिक में जब उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के पहलवान को केवल कुछ ही मिनट में नॉकआउट कर दिया था तो सभी जनता देख कर चौकन्नी रह गई थी। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के बिली जेर्निगन को भी हराया था, लेकिन बाद में वह इरान के पहलवान मनसूर रायसी से हार गए।

1952 का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक

खाशाबा जाधव जी का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक काफी दिलचस्प रहा था। 1948 में हारने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने वजन पर ध्यान दिया और 125 पाउंड बेंटमवेट डिवीजन में 24 अलग-अलग देशों के पहलवान के बीच प्रतिस्पर्धा की।

1952 का ओलंपिक केडी जाधव जी के लिए काफी थका देने वाला था। क्योंकि एक मैच के बाद उन्हें तुरंत ही सोवियत संघ के राशिद मम्मडबेव से कुश्ती करने के लिए कहा गया था, जबकि किसी भी एक मैच के बाद 30 मिनट का ब्रेक होता है। फिर भी केडी जाधव जी राशिद से लड़े परंतु बहुत ही थके हारे होने के कारण वे इस मैच में हार गए।

परंतु फिर भी इन्होंने अपनी काफी ज्यादा हिम्मत दिखाई थी और 23 जुलाई 1952 को कई अलग-अलग पहलवानों को हराकर यह भारत के पहले पदक विजेता बने।

खाशाबा दादासाहेब जी की मृत्यु

खाशाबा दादासाहेब जी की मृत्यु सन 1984 में एक कार के दुर्घटना में हुई थी। उनकी पत्नी ने खाशाबा जी के लिए सहायता प्राप्त करने की भी कोशिश की पर वह नाकाम रही जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई।

खाशाबा दादासाहेब जाधव जी को मिले अवार्ड और सम्मान

  • ईनका सम्मान 1982 के एशियाई खेलों में मशाल रिले में भाग लेकर किया गया था।
  • 2000 में उनके मरने के बाद इन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • उनके मरने के बाद 1992 से 1993 में छत्रपति पुरस्कार महाराष्ट्र सरकार द्वारा दिया गया था।
  • 2010 में दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए निर्माण किया गया कुश्ती क्लब को इनके नाम पर रखा गया।

निष्कर्ष

आज के इस लेख में हमने Khashaba Dadasaheb Jadhav biography in hindi जाना। उम्मीद है कि इस लेख के माध्यम से आपको खासाबा दादा साहेब जी की कुश्ती और उनके बारे में अच्छी जानकारियां मिल पाई होंगी।

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Major General Ian Cardozo Biography in Hindi : जानिए कौन थे मेजर जनरल इयान कार्डोजो, जिनपर आधारित है अक्षय कुमार की फिल्म गोरखा https://indiangovs.com/ian-cardozo-biography-in-hindi/ https://indiangovs.com/ian-cardozo-biography-in-hindi/#respond Sat, 07 Jan 2023 09:41:58 +0000 https://indiangovs.com/?p=5907 Read more

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Ian Cardozo Biography in Hindi : इस बात को हम सभी जानते हैं कि हमारा भारत देश वीरों का देश हैं। हमारे देश की इस मिट्टी पर हजारों ऐसे वीर योद्धा पैदा हुए हैं जिन पर दुनियाभर के लोगों को नाज हैं। हमारे देश में ऐसे भी वीर योद्धा पैदा हुए हैं जिन्होंने सेना में भर्ती होकर अकेले ही सैकड़ों दुश्मनों को भी धूल चटाई है। आज हम ऐसे ही एक वीर सपूत के जीवन के बारे में Major General Ian Cardozo Biography in Hindi जानने वाले हैं।

Ian Cardozo Biography in Hindi

वैसे तो आपने अब से सेना के बहुत से जवानों की बायोग्राफी पड़ी होंगी परंतु सेना के जिस जवान की बायोग्राफी आज हम आपको बताएंगे वह बिल्कुल ही अलग हैं। यह सेना के वीर जवान Ian Cardozo की बायोग्राफी हैं। यह एक ऐसे बहादुर थे जिन्होंने जंग में घायल होने के पश्चात खुद ही अपना पैर काट लिया था और इसके बाद भी दुश्मनों से लड़ते रहे थें। आगे हम आपको Ian Cardozo के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।

Ian Cardozo Biography in Hindi

मेजर जनरल इयान कार्डोजो का जीवन परिचय
नाम इयान कार्डोजो
पिता का नाम विंसेट कार्डोजो
माता का नाम डायना कार्डोजो
पत्नी का नाम प्रिसिला कार्डोजो
जन्म तिथि 7 अगस्त 1937
जन्म स्थान मुंबई
पद मेजर जनरल
सेना में सेवा दी 1954 से 1993 तक
लड़ाई और युद्ध 1971 भारत पाकिस्तान का युद्ध व सिलहट का युद्ध
पुरस्कार सेना पदक व अति विशिष्ट सेवा पदक
पुत्र व पुत्री इनकी तीन संतान है
अध्यक्ष भारतीय पुनर्वास परिषद
प्रसिद्धि युद्ध में खुद अपना पैर काट लेना
आंखों का रंग काला
यूनिट 1/5 गोरखा राइफल्स एवं 4/5 गोरखा राइफल्स
धर्म ईसाई
लंबाई 5 फिट 8 इंच

युद्ध में घायल होकर खुद ही काटा अपना पैर (Major General Ian Cardozo Story in Hindi)

Ian Cardozo सेना के एक ऐसे जवान हैं जिनका जन्म 7 अगस्त 1937 में भारत में ही हुआ था। उन्होंने 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय बारूद से घायल होने के पश्चात खुद ही खुर से अपने पैर को काट लिया था और इसके पश्चात भी यह लगातार लड़ाई लड़ते रहे थे।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इन्हें रेजिमेंट के लोग कार्टूस साहिब के नाम से भी बुलाते थें। यह जबसे सेना में भर्ती हुए थे तो तभी से ही यह बहुत ज्यादा निडर थे और कभी भी युद्ध में पीछे नहीं आते थें।

इस समय Ian Cardozo जीवित है और उनकी आयु लगभग 84 वर्ष हैं। यह अपने परिवार के साथ मुंबई महाराष्ट्र में ही रहते हैं।

मेजर जनरल इयान कार्डोजो की बहादुरी पर बनी है फिल्म गोरखा

Major General Ian Cardozo एक दमदार गोरखा सैनिक थे जिन्होंने खुद ही अपना पैर काटने के पश्चात भी युद्ध नहीं छोड़ा। इसीलिए इनकी इसी बहादुरी की वजह से इन पर फिल्म बन रही है जिसमें Major General Ian Cardozo का किरदार अक्षय कुमार निभा रहे हैं।

इस फिल्म में इनके बचपन से लेकर वर्तमान समय तक हर एक दृश्य दिखाया जाएगा। साथ ही यह भी दिखाया जाएगा कि इन्होंने किस प्रकार निडर होकर खुद ही अपना पैर काटा था।

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